छांगरू की गुफा में रहस्यमय कंकाल

कंकालों से भरी छांगरू की गुफा का रहस्य अब तक अनसुलझा है। आखिर ये कंकाल किसके हैं। कितने पुराने हैं। इन्हें इस खतरनाक चट्टान वाली गुफा तक किसने और कैसे पहुंचाया। क्या यह कंकाल, इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रचलन का सबूत हैं या फिर उच्च हिमालय का यह प्राचीन गांव अतीत में किसी महामारी की भेंट चढ़ने के संकेत हैं।

कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर पिथौरागढ़ जिले की चीन-नेपाल से लगी सीमा पर खूबसूरत ब्यांस घाटी है। घाटी के दोनों ओर रं शौकाओं के गांव हैं। ज्योलिंगकांग, ओम पर्वत, टिंकर और आपि-नाम्पा की श्रृंखलाओं के विस्तार के बीच पसरी इस घाटी को कालापानी से निकलने वाली नदी काली या महाकाली, भारतीय और नेपाली ब्यांस में बांटती है।

भारत की तरफ बूंदी, गर्ब्यांग, नपल्यचू, गुंजी, नाबी, रांगकांग और कुटी गांव हैं। जबकि, काली नदी के पार नेपाल में छांगरू और तिंकर। तिंकर से ऊंचाई की ओर बढ़ते चले जाने पर तिंकर दर्रे के उस पार तिब्बत का ताकलाकोट है और नाम्फा की तरफ मारमा की ओर नेपाल की अन्य बसासतें। गर्ब्यांग से कुछ आगे बढ़ने पर आता है, भारत और नेपाल की सीमा विभाजक काली नदी पर बना सीता पुल। पुल पार करीब डेढ़ से दो किमी की दूरी पर है, दिलचस्प किस्सों, कहानियों को समेटा छांगरू गांव।

अंग्रेजों ने किया ब्यांस घाटी का बंटवारा

19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में असकोट के रजवारों ने ब्यांस घाटी के नेपाली गांवों को अपने अधीन कर कुमाऊँ में मिला लिया था। 1815 में कुमाऊँ के ब्रिटिश शासन के अधीन आ जाने के बाद ब्यांस घाटी दो हिस्सों में बाँट दी गई। एंग्लो-गोर्खा युद्ध के उपरांत गोरखा शासकों और अंग्रेजों के बीच हुई सिगौली की संधि (1815) के परिणामस्वरूप काली या महाकाली नदी ब्रिटिश भारत और नेपाल के बीच सीमा विभाजक मान ली गई और इस तरह ढलान की ओर उतरती हुई महाकाली नदी के बाईं ओर बसे छांगरू, टिंकर समेत अन्य सभी गांव नेपाल का हिस्सा बन गए।

एटकिंसन काली को तिंकर नदी समझ बैठे

इस इलाके का वर्णन करते हुए हिमालयन गजेटियर में एटकिंसन लिखते हैं ‘गर्बिया या गर्ब्यांग से रास्ता नदी की तलहटी की ओर उतर जाता है। तिंकर नदी पर पुल से यह रास्ता पार होता है। तिंकर नदी यहाँ पर काफी बड़ी है। हालांकि, एटकिंसन ने जिस पुल का जिक्र किया है, वह तिंकर नदी पर नहीं, काली नदी पर बना है। तिंकर तो नेपाल की तरफ से आकर बांयी तरफ से काली में मिल जाती है। जबकि, भारत की सीमा काली के दायीं ओर है। पुल के ऊपर और खड़े नदी तट के सिर पर छांगरु गांव है (यह गाँव समुद्र सतह से 9990 फुट पर है।कुछ नए अध्ययनों में इसकी ऊंचाई कहीं 10 हजार तो कहीं 11 हजार फुट बताई गई है)।

अपनी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति विशेषकर चारों ओर उच्च हिमालयी शृंखलाओं से घिरे होने के कारण छांगरू, तिंकर जैसे गांव मुख्य नेपाल से सीधे आवागमन की सुविधा से आज भी वंचित हैं। यहाँ से उत्तर में तिंकर दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करके वहाँ से एक बार फिर हिलसा दर्रे को पार करते हुए करनाली के साथ चलकर नेपाल की मुख्य धरती में पहुंचा जा सकता है या फिर रापला होते हुए दार्चुला आया जा सकता है। सामान्यतः ग्रामीण छांगरु से नीचे उतर कर सीतापुल से काली नदी को पार करके भारतीय सीमा में बसे गर्ब्यांग गांव से होते हुए धारचूला आ कर और वहाँ से एक बार फिर काली नदी को पार करते हुए खलंगा-दार्चुला, नेपाल आना जाना करते हैं।

इस घाटी का विस्तार अत्यंत आकर्षक है। एटकिंसन 19वी सदी के ब्यांस घाटी के गांवों की सुंदरता और समृद्धि का चित्रण करते हुए बताते हैं कि यहाँ के गांवों में अधिकांश मकान दो मंज़िले हैं और लकड़ी में खूबसूरत नक्काशी की हुई है। वो लिखते है ‘काली नदी के पूर्व में तिंकर नदी घाटी के गांव नेपाल की प्रजा हैं और पूर्व व दक्षिण पूर्व की बर्फीली चोटियों के कारण नेपाल से अलग थलग हैं। राजनैतिक स्थिति के सिवाय हर दृष्टि से ये ब्यांस का हिस्सा हैं। यह उल्लेखनीय है कि दो अलग-अलग देशों के नागरिक बन जाने के बावजूद आज भी ये बृहत्तर ब्यांसी सांस्कृतिक समाज का हिस्सा हैं।

एंड्रू ई मंजार्डाे और डिल्ली राज दहल उल्लेख करते हैं कि छांगरु 100 परिवारों वाला गाँव है जबकि तिंकर में 80 परिवार रहते हैं। 2016 में छांगरु की जन संख्या 586 थी जिसमें 286 महिलाएं और 300 पुरुष थे। अपने शीतकालीन प्रवास में यहाँ के लोग खलंगा-दार्चूला के बंगा-बगड़ आ जाते हैं। अतीत में खलंगा-दार्चूला वासियों से अपने इन शीतकालीन आवासीय स्थलों को लेकर इनके झगड़े भी होते रहे हैं। 1888 में एक बार जमीन पर अधिकार को लेकर विवाद इतना गहरा गया था कि 1904 में तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री चंद्र शमशेर ने सनद जारी कर ब्यांसियों के शीतकालीन प्रवास के लिए आजन्म छः माह जमीन का उपयोग करते रहने का अधिकार सुनिश्चित किया था।

गांव के शीर्ष पर कंकालों से भरी गुफा

छांगरू की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना और प्रचलित मिथक इस इलाके को बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। गाँव से लगभग 900 फुट (समुद्र सतह से 11998 फुट की ऊंचाई) पर चट्टानों में बनी गुफा जिसे ग्रामीण छांगरु-राखू कहते हैं, न केवल अनोखी है बल्कि अनेक मिथकों को अपने में समेटे हुए है। 1906 में पहली बार चार्ल्स सी शेरिंग ने अपनी किताब वेस्टर्न तिब्बत एंड ब्रिटिश बार्डरलेंड में इसका दिलचस्प वर्णन करते हुए इसके मिथकों से दुनिया को रूबरू कराया था। शेरिंग ने लिखा था कि ‘यह गुफा गांव से ऊपर है, चढ़ाई बहुत खड़ी और कठिन है, क्योंकि वहां कोई रास्ता नहीं है और पिछले साल जब हम वहां पहुंचे तो हमें कांटों और झाड़ियों से होकर गुजरना पड़ा। पुराने दिनों में यह गुफा बड़ी थी, लेकिन गुफा का एक किनारा गिर जाने के कारण यह काफी छोटी हो गई है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह यहाँ के लोगों के निवासों में से एक हुआ करता था। हमने पाया कि यह मृतक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के शरीरों से भरी पड़ी हुई है, जिनमें से कुछ शरीरों में गुफा के अंदर सूखेपन के कारण बाल और मांस तक सुरक्षित थे। ग्रामीण इसे राक्षसों और भूतों से भरा स्थान मानते हैं और वहां जाने से बचते हैं।

चार्ल्स शेरिंग के तीस साल बाद हिमालय अध्ययन अभियान में निकले स्विस भूगर्भ वैज्ञानिक अर्नाेल्ड हाईम और आगस्ट गैनसर ने अपनी किताब द थ्रोन ऑफ गॉड में पहली बार इस गुफा में रखे गए कंकालों से जुड़े किस्से कहानियों को समेटा था। गैनसर लिखते हैं कि छांगरु गाँव की मुखिया हिमेती पधानी, जो आकर्षक और तीखे नाक-नक्श वाली एक सयानी महिला थी, बोरो या बोरा समुदाय से थी। हेमेती ने अपने घर हमें आमंत्रित किया और चाय पर एक बहुत पुरानी लोककथा सुनाई। उसने बताया कि ‘बहुत पहले यहाँ से नाम्फ़ा घाटी की हिमालयी चोटियों को पार करते हुए एक रास्ता मारमा गांव की ओर जाता था। आज जहां चारों ओर बर्फ दिखाई दे रही है तब वहां खूबसूरत फूल खिला करते थे। गैनसर यह जानकर हैरान थे कि श्राप से स्विस आल्प्स के मैदानों में फूलों के लुप्त होने जैसी किंवदंतियां हिमालयी स्विट्जरलैंड के इन अल्पज्ञात इलाकों में भी मौजूद हैं। हेमेती ने आगे बताया कि, मारमा के लोग अक्सर यहाँ आते और यहाँ कि लड़कियों से विवाह करके ले जाते थे। इस तरह बोरो या बोरा जाति अस्तित्व में आई। एक बार एक बोरो महिला मारमा से अपने बच्चे को लेकर छांगरु आई। वह यहां एक घर बनाना चाहती थी। एक दिन उसका बच्चा एक तीखी धार वाले पत्थर से खेल रहा था। अचानक पत्थर से उसकी एक अंगुली कट गई और घाव से खून बहने लगा। जहां-जहां खून लगता घर की दीवार अपने आप बढ्ने लग जाती। यह देख गांव के लोग आश्चर्यचकित थे। उन्हें लगा कि बच्चे के खून में कोई चमत्कारिक दैवीय शक्ति है। इस उम्मीद में कि ज्यादा खून से न जाने और क्या-क्या चमत्कार हो जायें, उन्होंने बच्चे को काट डाला। इस घटना से शोक में डूबी मां सारे गांव को काली चेचक फैलने का श्राप देकर अंततः वहां से लौट गई। कुछ वर्षों बाद पूर्णिमा की एक रात गांव के दो लोग पास के घट (पनचक्की) में गेहूं पीसने गए थे। उनके चेहरे पर पिसाई के दौरान आटे की परत लग गई थी। इस दौरान चक्की के ठीक से काम नहीं करने पर उनमें से एक उसे ठीक करने चला गया। उसका चेहरा आटे की परत पर पानी के छींटे पड़ जाने से डरावना दिखने लगा था। जब वह लौटा तो उसका साथी उसे पहचान न सका और चेचक दैत्य समझ घबरा कर गांव की ओर भाग गया। उसी समय गांव में चेचक भी फैली थी। लोगों को उस महिला का श्राप याद आ गया। गांव के सारे लोग अपने परिवार और धन संपत्ति सहित छांगरु राखू की ओर चले गए और अंतत गुफा में गायब हो गए। उसके बाद उनका कुछ पता नहीं चला। इस तरह सारा गांव उजाड़ गया। बहुत वर्षों बाद कुछ नए लोग यहाँ आए और वीरान पड़ी झोपड़ियों में रहना शुरू किया। इस तरह एक बार फिर यह गांव आबाद हुआ।

गैनसर लिखते हैं कि अगले दिन वह और उनके कुछ साथी उस गुफा में गए। वहाँ प्रवेश द्वार पर बैठी मुद्रा में एक नर कंकाल पड़ा था। कुछ और खोपड़ियाँ भी वहां पर थी। पास ही ज्या (शौका/तिब्बती चाय) बनाने के लकड़ी के दो बेलनाकार बर्तन और कुछ हथियार भी वहाँ रखे थे। भीतरी हिस्से में कुछ लकड़ी के बक्सों में बच्चों के कंकाल थे। गुफा ढेर सारी हड्डियों से भरी पड़ी थी। 1949 में स्वामी प्रणवानन्द ने भी अपनी पुस्तक में इस गुफा का जिक्र किया था। 1969 में फ्रांसीसी शोधकर्ता क्रावेन ने भी छांगरू की गुफा को समझने की कोशिश की थी। केनिथ सेकर और गॉर्डन टेरी ने इस इलाके में चूना पत्थर गुफा शृंखला होने का जिक्र करते हुए बूंदी, पेल्सीती, लुङ्ग्तियार, रापला, गुकुंग कारलिङ्ग और कुटी की ब्यांस गुफाओं का उल्लेख किया है। हालांकि इनमें कोई नर कंकाल नहीं मिले हैं।

यह उल्लेखनीय है कि उच्च हिमालयी इलाकों, खासकर तिब्बत, चीन के प्राक बौद्ध और यहाँ तक कि दक्षिण पूर्व एशिया के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कई समुदायों में मृत्यु संस्कार में शरीर को ताबूत में रख ऊंची चट्टानों में बनी गुफाओं में रखने या चट्टान में लटकाने का चलन था। नेपाल के मुस्ताङ्, दक्षिण पश्चिमी चीन के सिचुआन और यूनान प्रांत के बो समुदाय, और खासकर शिनग्वान, व्हू झी, ज्याङ्ग शी, बाय निन थाङ्ग, शिन छ्यो बे, खो, चो छ्यू छन, लुओ बियाओं जैसे इलाकों में अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार की इस परंपरा का इतिहास हजारों साल पुराना है। यून्नान वंश के इतिहास ‘ब्रीफ़ क्रोनिकल्स ऑफ यून्नान’ के लेखक ली झिंग कहते है कि यह बहुत ही शुभ और पवित्र प्रक्रिया थी।

इसी तरह दक्षिण एशियाई देश फिलीपींस के उत्तरी इलाके ईगोरोट्स में सगादा पहाड़ियों में रहने वाले समाज में भी अंतिम संस्कार की ऐसी ही अनोखी रस्म प्रचलित है। यहाँ तो बुजुर्गों द्वारा जीवित रहते ही पेड़ के खोखले तनों से अपने लिए ताबूत बना लेने का रिवाज है। इनकी मान्यता है कि मृतक शरीर जितने एकांत और ऊंचाई में रखा जाएगा वह ईश्वर के उतने ही करीब रहेगा। यह कहा जाता है कि सगादा के लोग पिछले दो हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस परंपरा को मानते आ रहे हैं। आज नेपाल, चीन और फिलीपींस में ऐसी गुफाएं अध्येताओं और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन के लिए खासे आकर्षण का केंद्र बन गई हैं।

यह एक रोचक तथ्य है की छांगरु से 10 किमी आगे टिंकर गाँव में आज भी गोम्पा का अस्थित्व और सांस्कृतिक मान्यताये इस घाटी में तिब्बती संस्कृति के प्रभाव की संभावनाओं से इंकार नहीं करती हैं। छांगरु राखू अभी बहुत चर्चा में नहीं है। दरअसल छांगरु की गुफा के मानव अवशेषों को नृत्वीय और सामाजिक इतिहास की दृष्टि से समझा जाना, हिमालय और उत्तराखंड की समाज संरचना, मान्यताओं और इतिहास के नजरिए से भी दिलचस्प होगा।

गिरिजा पांडे
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12 Comments on “छांगरू की गुफा में रहस्यमय कंकाल”

  1. अद्भुत वृत्तांत लिखा है प्रो. गिरजा पांडे आपने। इतनी दिलचस्प और रहस्यमयी प्रथाओं के अवशेष हमारे आसपास बिखरे हुए हैं और हम में से ज्यादातर लोग उनसे वाक़िफ़ ही नहीं हैं।

    1. बहुत श्रम साध्य लेख है आनंद आगया लेखनी में ताजगी पुरातन की है । प्रतीक्षा रहेगी
      ऐसे ही नए लेख की

  2. रोचक लेख! छांगरू की गुफा के बारे में इन तथ्यों से अनभिज्ञ था, आपने बहुत अच्छे से इन्हें सहेजा…

    1. पढ़ कर आनंद आया। इतिहास, भूगोल, नैसर्गिक सौंदर्य और रहस्य, सब कुछ बड़ा रोचक है। ऐसे और लेखों की प्रतीक्षा रहेगी।

  3. पढ़ कर आनंद आया। इतिहास, भूगोल, नैसर्गिक सौंदर्य और रहस्य, सब कुछ बड़ा रोचक है। ऐसे और लेखों की प्रतीक्षा रहेगी।

  4. This article took me back in time when myself along with Gurudev (Dr R K pant) way back in early 90s were working on tbe sediment deposited in the geological past in a glacier lake that existed between Chiya Lek and west of Gunji.
    Taklakot baypar just restarted and i could see reluctantly some people from Dharchula decided to trade with guys from south southern Tibet, although i do not think it was that exciting as it used to be before 1962.
    Well i used to give money to poney riders carrying goods to Taklakot for my beverages as every day they crossed my camp that i pitched below the school building (one of the oldest School in Uttrakhand) which they used to deliver next day on their return journey. This is the way i was connected with fascinating landscape and the gloomy faces of Western Tibet.
    In my leisure time, particularly after partially finishing the pains taking sampling, i used to cross the bridge over Kali and stroll in Changru abd sone time Tinker villages. changru, unlike Garbayang is nicely maintained robustly built and well populated (Garbayang is a sinking village these days became of lack of maintains against the toe erosion by fast flowing Kali and virtually deserted those days).
    Those days a guy from Tinker who had a well built house and provided accomodation to the adventure tourists on way to Api and Nampa approached me knowing that i am doing geological excavation to accompany him to the cave above Changru. He told me that besides skeleton which i already knew from the work of Heim and Gansser, there are valuable antiquities and he wanted me to asses them for their age. This would imply that he probably already collected sone of them from burial cave above Changru village.
    Later on i was told that this guy is in the business of collecting antiques from the area abd probably making fortune out of it.
    Well i decided to go with him but then the local from Changru told me that i am Indian and on government duty, and the cave is in Nepal, hence the Nepali authorities may not take it kindly. I decided not to go and now realise it was wise decission.
    Well i agree with prof Girija Pandey that cave burial practices in Trans Himalayan valleys ate quite old. To name few there are evidence from Lipa valley (Spiti), and Malari in Uttrakhand which dates back to pre-buddhist period (probably the beginning of early iron age culture) and continued with the emergence of Buddhism!!!
    Considering that Trans Himalayan valleys are the region of early settlements (Prof Girja may correct me), i am not surprised to find them. Interestingly, these evidences if adequately investigated using the radiocarbon and isotope studies can through light on their antiquity and the places from where the human civilization migrated to these wonderful valleys of Trans Himalaya.
    Once again I must congratulate Prof Girja Pandey and Gaynma for bringing g out stories from the land of divinity.

  5. बेहद रोचक, तथ्यपूर्ण और पठनीय। भाषा का प्रवाह और विषय की गंभीरता दोनों साथ साथ चल रहे हैं। ऐतिहासिक और भौगोलिक चेतना सा सधा हुआ निर्वाह है।
    आम तौर पर ऐसे विषय को तथ्य हीन रहस्य में लपेट कर प्रस्तुत किया जाता है लेकिन यहाँ इस बात को पूरा ध्यान रखा गया है।

  6. छांगरू गुफा के रहस्यों पर इतनी रोचक और शोधपूर्ण जानकारी पढ़कर मन वास्तव में रोमांचित हो गया। इतिहास के ऐसे अनछुए पहलुओं को सामने लाना न सिर्फ हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ता है। ऐसे प्रयासों के लिए सर आपका हार्दिक आभार।

  7. एकदम रहस्यमय और कौतूहलपूर्ण जानकारी। उत्तराखण्ड में रूपकुण्ड के बाद यह दूसरा जीवित इतिहास है मेरे लिए।

  8. जानकारी- भरा, दिलचस्प और जिज्ञासा जगाने वाला प्रवाहपूर्ण लेख….

  9. पांडे जी आपका आभार, बचपन से कई टुकड़ों मै दंत कथाओं की तरह सुना करते थे, मेरी भी मंशा थी इसमें कुछ समय दूं पर न हो पाया, एक बार लखनऊ मै, मैने भारत के जाने माने DNA विशेषज्ञ डॉ. लाल सिंह जी निदेशक CCMB से जिक्र किया था अध्ययन हेतु, संज्ञान मै आया था कि कुछ सैंपलिंग भी ली गई थी परन्तु आगे जानकारी न हो पाई। बहरहाल ,आपने बहुत से स्त्रोतों का अध्ययन कर एक तार्किक आलेख “राखू” पर लिखा आपका पुनः आभार।

  10. A well researched and well written article by Prof Girija Pandey deserves appreciation and inspires others to come up with such unknown aspects of Himalayas.

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